पुराने बीज 

आज सोचा कि चलो कुछ अपने ऊपर लिखूं, अपने नए परिचय से अपने दोस्तों को चाहने वालों को परिचित कराऊं। 
कुछ बंद पड़ी खिड़कियों को खोल दूं , पुरानी अलमारियों में झांकू और ढूंढो उन बीजों को जो 
जाने-अनजाने कहीं दवे पड़े थे, फिर उम्र के इस दौर में अंकुरित हो गए। 

कौन है जिसने मेरे हाथ कंप्यूटर के कीबोर्ड से हटाए और एक कलम पकड़ा दी? 
पहले अंग्रेजी और हिंदी और फिर पंजाबी, जो ना तो लिखनी आती है ना पढ़नी 
और वह भी इस उम्र में जब की परछाइयां मेरे कद से ज्यादा लंबी हो चुकी है,  
धीरे-धीरे और लंबी होती जा रही हैं। पीछे मुड़कर देखता हूं तो एक प्रश्न जो 
अक्सर मुझसे आकर बार-बार टकरा जाता था कि जब मैं अपने प्रोफेशन का 
काम नहीं करूंगा तो क्या करूंगा। इंजीनियर में बनना चाहता था और बना। 
पर यह तीन भाषाओं में लेखन ना तो मैंने कभी सोचा था और ना ही कहीं कभी उसकी कोई तैयारी करी थी। 

सोचता हूं कि मैं किसी भ्रम में तो नहीं? कभी कॉफी पी के तो कभी आंखों पर पानी के छींटे मार
 के एहसास पक्का करता हूं, अपने लिखे शब्दों को बार बार पढ़कर और रिकॉर्डेड कहानियों 
को बार-बार सुनकर, कि मैं जाग रहा हूं। 

अंग्रेजी में लिखना ज्यादा देर नहीं चला। अक्सर कंप्यूटर का कीबोर्ड जैसी मेरी टाइपिंग स्पीड का 
इम्तिहान लेता था। इस से ज्यादा कुछ नहीं एक हल्का सा झोंका आता था, कुछ शब्द कंप्यूटर में छप जाते थे 
और सारा किस्सा 10-15 मिनट में खत्म।  सारी उम्र तक बस मैंने एक काम किया, अपने सारे 
अनुभवों को संजोता रहा, जोड़ता  रहा। धीरे-धीरे इतना मसाला इकट्ठा हो गया कि दिल दिमाग में एक 
प्राइवेट कमरा जो कि एक तहख़ाने जैसा है बन गया। इस तहखाने में मेरे अलावा और कोई नहीं आ सकता। 
बस कुछ पुरानी यादें और मेरी कहानी के पात्र आ सकते हैं। अब मैं अकेलेपन से ऊबता नहीं। 
मेरी कहानी के पात्र आ जाते हैं और अपनी  कहानियां सुना जाते हैं, लिखवा जाते हैं, कुछ आवाजें हैं 
जो आकर छेड़खानी कर जाती हैं।

 एक दिन बातें करते करते एक कहानी ने जन्म लिया कोई पुराना दबा बीज अंकुरित हो गया। एक-एक करके कहानी के पात्र
 तहख़ाने  में जमा होने लगे और खुस्बुसाहट करने लगे। उनमें से कोई एक मुझे एक कलम 
और रजिस्टर दे गया और शुरू करा गया एक कहानी। हिंदी लिखना मैं लगभग भूल चुका था और 
लिखने से कतरा था था। मुझे इस झिझक अब से मुक्त करा गया। 

एक खोई हुई लॉटरी की टिकट जो खोकर एक किन्नर की झोली में आ गिरी थी। 
शुरू हो गई, कहानी शुरू होती है, कहानी का मुख्य पात्र जो अपनी प्रमोशन की खबर सबसे पहले 
अपनी मां को देना चाहता है, मुझे 1979 में ले गया जब मैंने अपनी पहली सैलरी का लिफाफा 
अपनी मां को दिया था। मेरी मां आ गई, दो आंसू, रजिस्टर के पन्नों को भिगो गये। 
नए पात्र आ गए खुसर फुसर करने लगे, बेचैन करने लगे। लिखो हमें नहीं तो तुम्हें सोने नहीं देंगे। 

और जब सो कर उठता हूं तो नए किस्से कहानियां और पात्र आ जाते हैं। 
अपनी अपनी सुना जाते हैं। नए एहसास नहीं अदाएं और नई मजबूरियों को छोड़ जाते हैं। 
इसलिए ये दौर लंबा होता जा रहा है। 

क्या मेरे हाथों में कलम मेरी मां ने पकड़ाई और भाषा पिताजी दे गए? 

शायद कोई नया सितारा मेरी कल्पना के आकाश में उदित हुआ होगा और 
पुराने बीजों को अंकुरित कर गया होगा।
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