काम देव की कमान


काम देव की कमान से निकला,
तीर प्रेम का पश्चिम में।

उत्तर दिशा में मिला शिवम को,
आकर्षण के उत्सव में।

प्रेम के पथ पर, चंचल मन से,
आशाओं के विस्तृत पल में।

बांध गया प्रेमी युगल को,
जनम जनम के बन्धन में।

दूसर माह की दशम तिथि,
जब जब कैलेंडर पर छाएगी।

संस्कारों के मधुर मिलन को,
और सशक्त कर जाएगी।

सदा फलित संकल्प तुम्हारा,
देवताओं का निर्णय हो।

ये कविता समर्पित तुमको,
परम आनंद का उद्गम हो।





गौ माता की पूजा


वो सब जो गाय को गौ माता बताते हैं, 
दोगले हैं, सच बोलने से घबराते हैं। 

सच बताओ गाय अगर गौ माता है,
तो नवजात बछड़ा किसका भ्राता है,

कायर है सब सच सुनने से कतराते हैं।
तर्क हीन हो, पौराणिक कथाएं सुनाते हैं। 

देखना, नवजात शावक का नर या मादा होना,
मुंह बोले भक्तों द्वारा, बच्चों की हत्या होना।

कितना मुश्किल है गौ माता का, माता होना,
मानव समाज की भोगेच्छा को गर्भ में ढोना।
 
घायल देह, दर-दर भटकना बेघर होना,
अच्छा है मर जाना, किसी का भोजन होना।

ईश्वरीय दंड है, गाय योनि में जन्म होना,
भक्तों का खिलौना, मंदिरों में स्थापित होना।

जो गौ माता की पूजा ध्यान करते हैं,
अपनी माता का ही दुग्धपान करते हैं।





यह कविता समर्पित तुमको


पहले माह का अंतिम दिन, दो हज़ार में आठ थे कम,
थामा हाथ, एक दूजे का, साथ रहें हम जनम जनम।

अदृश्य बंधन का धागा है, हम दोनों के बीच सनम,
प्रतिवर्ष गिरह लग जाती है, चौंतीस हुई पर लगती कम।

एक हो गए तन मन धन से, सुंदर सुखद सुहाना संगम,
तुम चलो मेरे पथ प्रियतम, मैं तुम्हारे कदम कदम,

यह कविता समर्पित तुमको, सहित प्रेम उद्गार परम,
नई गिरह की बधाई तुमको, बीते हर पल अति से उत्तम।




नारी शक्ति का उदय



राम रावण युद्ध में भैया किसने किया था  भीतर वार,
शक्तिशाली रावण की सेना, जीते रघुकुल राजकुमार।

लंका युद्ध समाप्त हुआ और लौटी सीता मैया,
इसके आगे क्या हुआ, सुनो ध्यान से भैया।

विभीषण विरजे सिंहासन पर, प्रजा ने अस्वीकार किया,
लंकापति हों रावण भ्राता, जन जन ने प्रतिकार किया।

प्रजा चली आंदोलन पथ पर, एकल स्वर  हुंकार किया,
यूं ना चले लंका का शासन जो राक्षस कुल का नाश किया।

सेना बल था क्षीण हो चुका राजकोष था खाली,
विडंबना में घिर गए राजन, कहुं विधि चली राज्य प्रणाली।

जन विद्रोह का दमन करें तो होगा, अनुचित अत्याचार!
लंकेश पद का त्याग करें, या युतिगत विमर्श विचार,

जनमानस जो अति विक्षिप्त था, ऐसा नरसंहार हुआ,
जीवित थे महिलाएं और बच्चे घर घर में अवसाद हुआ।

चिंतित राक्षस राजन ने अगस्त मुनि का ध्यान किया,
जनाक्रोश की कथा सुनाई दैविक निर्णय का आह्वान किया।

सुना ध्यान से ऋषिवर ने, फिर कुछ पल विश्राम किया।
पास बुलाया राजन को, दैविक निर्णय का व्याख्यान किया।

राक्षस वंश का ध्वंस नियत था, सीता माता ने श्राप दिया।
लेकिन कुल जननी माता को दैविक श्राप से मुक्त किया।

दिव्य दृष्टि से देखा मैंने, नारी शक्ति का उदय अहो,
दैविक इच्छा है लंका में मंदोदरी का शासन हो।

यही एक युक्ती है, प्रिय राजन, सिंहासन का त्याग करो।
मंदोदरी को शासन सौंपो, राजकाज में मदद करो।




विधायकनमा - हिदायतनामा


मुबारक हो संतराम, तुम्हारी तरक़्क़ी हो गई,
लड़े ख़ूब, बने विधायक, आमदनी पक्की हो गई।

कुछ हिदायतें हैं ज़रूरी, चाहे गाँठ बाँध लो,
हो के संतराम बाहर से, गब्बर को बदनाम होने दो।

डकैती का काम औरों को सिखाओ, ग़रीबी दूर कर दो,
तुम्हारा शुक्राना ऊपर तक पहुँचे, पुख़्ता इंतज़ाम कर लो।

तुम्हारे इलाक़े की सब करामातें, होंगी तुम पर क़ुर्बान,
ख़ुद चले आएँगे मुबारक देने—चमचे, पट्ठे और पहलवान।

तुम्हारी शख़्सियत में हैं दो किरदार, एहतियात रखना,
गरीबों के संतराम, और अमीरों के लिए गब्बर बने रहना।

तुम्हारे इलाक़े में सरकारी ख़र्च, तुम्हारी मर्ज़ी से होगा,
ठेकेदार कोई भी हो, हिस्सा सबका बराबर होगा।

ठेकेदारी की हिस्सेदारी के हक़दार चार होंगे,
मैं, तुम, पार्टी और बाक़ी सरकारी बाबू के होंगे।

अगर चाहते हो इस ओहदे पर बने रहना,
बाबाओं और भजन मंडली का जाप करते रहना।

अख़बारी ख़बरचियों को ख़बर से दूर रखना,
ग़र होने लगे बदनामी, तो मुझे याद करना।

कुर्सी पर टिके रहना है, तो नसीहत याद रखना,
भीड़ से हाथ जोड़कर मिलना, ख़बरों से दूर रहना।



छोटा सा आंगन

देहरादून के आंचल में एक छोटा सा आंगन
आप की रौनक से, दुआओं से सजता है, 
ये छोटा सा आंगन।

जश्ने डिनर हो या जश्ने बर्थडे,
आपकी शान की ख़ातिर में,
पूरे जोश में हाज़िर है, 
ये छोटा सा आंगन।

राज़ की बात थी जो 
अब तलक छुपी हुई,
जश्ने ज़ायके में,
मसालों की बारात शामिल हुई ।

हुक्म करें, क्या पेश करें?
पहले कुछ नमकीन, 
फिर कुछ और,
फिर कुछ मीठा हो जाए। 
के ये शाम बेतकल्लुफ़, बेमिसाल हो जाए। 

दोस्ती का वादा है हमारा, 
निभाएंगे, हर रोज, हर पल 
लौट के आईये, सब के साथ आईये,
हम तैयार हैं, रहेंगे, आज, अभी और कल।



ये नया साल

कैलेंडर के पन्ने पलटे जाएंगे, बदले जाएंगे,
के आ गया है, ये नया साल। 

नई उम्मीदें और कसमें जो खाई थी, 
पूरे हुई ना हुई, के आ गया है, ये नया साल। 

और जाने कुछ हो ना हो, सालगिरह में, 
एक और गिरह लगा जाएगा, ये नया साल।

ये वक्त जो रुकता नहीं, अच्छा  बुरा होता नहीं ,
अपना असर दिखा जाएगा, ये नया साल,

लेना देना बराबर, भूल चूक माफ़ करना,
के पूरा हिसाब मांगेगा, ये नया साल।

जुबां पे मिसरी रख ले, कर ले तेवर ढीले,
के मीठा गुजरेगा, ये नया साल।

यह वक्त क्या है, कुछ पता नहीं,
परवरदिगार का पैमाना है, ये नया साल।

अपनी दुआओं में करलो सब को शामिल,
के अच्छा गुज़रेगा, ये नया साल।




पत्ता पत्ता बूटा बूटा

पत्ता पत्ता बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने हैं,
जाने न जाने तू ही न जाने, गांव तो सारा माने है,

झूठ से नफरत है, मुझे ये यह राज़ सब कोई जाने है, 
पर मैं कभी सच ना बोलूं, अमीरों का दामन न छोडूं, यह बात कोई ना माने है,
 
पत्ता पत्ता बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने है, 
जाने ना जाने, तू ही ना जाने, शहर तो सारा माने है,

ताकत के इम्तेहां में अव्वल सदा मैं आता हूं यार,
ये दुनिया क्यों आंसू बहाए, विरोधी नारे लगाऐं, पर तू क्यों बुरा अब माने है,

पत्ता पत्ता, बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने हैं, 
जाने न जाने, तू ही न जाने, रियासत तो सारी माने है,

मेरे कुछ दोस्त है जो मेरे काम आए तुम्हें क्या पता,
ज़माने के दुश्मन क्या जानें, वफादारी ना पहचाने, मायने कुछ और कयूं निकाले हैं,

पत्ता पत्ता बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने हैं, 
जाने ना जाने तू ही ना जाने, देश तो सारा माने है।


जवाब

धन्यवाद भाई साहब, आपने कुछ सोचा तो लिखा,
और वही लिखा, जो आपको टीवी पर दिखा।

आपने लिखा है, तो ज़रूर कुछ सोचा होगा,
जीवन विकट है, आपने भी भोगा होगा। 

आओ मेरे गांव में, और देखो मेरा हाल,
दो वक्त की रोटी तो क्या, पानी भी है मुहाल।

सच कहा है आपने, कि सियासत एक बाज़ार है,
और मेरे जैसा, गरीब का बेटा, बिकने को तैयार है। 

मैं याद करा दूं, कि ये व्यवस्था मैंने नहीं रचाई,
कुछ सेठों नेताओं ने मिलकर, मेरी थाली की बोली लगाई। 

मैं आपके जैसा पढ़ा लिखा, धनवान तो नहीं, 
तो क्या मैं सीधा-सीधा, गरीब इंसान भी नहीं?

बिकना तो मेरी नियति है, कि जीना है मुझे, 
इसी बाज़ार में एक ज़हर है, रोज़ पीना है मुझे।

आपका दिलचस्प खेल, हमारा त्यौहार होता है,
खरीदने बेचने, बिकने और बिकवाने का रोज़गार होता है। 

बड़ा मज़ा आता है जब यह बाज़ार सजता है,
चंदू हलवाई और दीनू नाई का वाजिब दाम लगता है। 

यह त्यौहार कुछ-कुछ दिवाली जैसा है,
जब अमीरों के घर में दिया और गरीब के चूल्हा जलता है। 

फ़र्क सिर्फ इतना है, कि आपको फ़र्क नहीं पड़ता, 
कि आप के रंगीन चश्मे में, मैं दिखाई नहीं पड़ता। 

समझदार हो आप, मेरी बात ना परखो,
दो दिन भूखे सो जाओ, चिट्ठी दुबारा लिखो।
मुझ पर देवी की कृपा है

हेलो भाई साहब, माय-सेल्फ सर्व विषय गुरु ज्ञानी,
एम ए, बी ए, पी ए, डी ए, सब विषय हम जानी।

मैं था सर्व-प्रतिभाशाली, पर यह बात कोई ना मानी,
तब हमारे पार्टी प्रमुख ने हमारी योग्यता पहचानी।

ताकत झंडा पार्टी का, मैं अधिकारिक प्रवक्ता,
विषय बहस का कोई भी हो, मैं पीछे नहीं हटता।

पार्टी ने हर बात थी जो, मेरे मुख से कहलवानी,
काम बहुत कठिन रहा, पर मैंने हार न मानी।

इंग्लिश, हिंदी, भूगोल, साहित्य, या देवताओं की वाणी,
गूगल-शूगल, एआई, जीआई ने दूर कर दी परेशानी।

विरोधियों का विरोध करूँ, और प्रेस से वार्तालाप,
दो शब्द के विषय का, कर दूँ सारा दिन आलाप।

भगवा यूनिफॉर्म में देखो, मेरा आत्म-विश्वास,
मेरे कॉम्पिटिटरों ने झट से, ले लिया सन्यास।

दुष्ट पत्रकारों को दिया गया है, एक स्पष्ट आदेश,
उल्टे प्रश्न करें अगर, तो नौकरी रहे ना शेष।

मुझ पर देवी की कृपा है, राष्ट्रभक्ति है नारा,
मेरे चेले बन जाओ सब, मौका मिले ना दोबारा।
एक रौशन सितारा

अंधेरों ने ढूंढा है एक रौशन सितारा,  
चलो, हम भी बन जाए किसी आंख का तारा।  

विरानियों में पा लिया एक जश्ने बहारा,  
चलो, तुम भी बन जाओ एक उम्मीद का सहारा। 

जाते हुए घर बाँट दो खुशियां बराबर, 
आते हुए मिल जाएंगी वापस वह बढ़कर! 

कुदरत का है दस्तूर, चलो, क्यों ऐसा न करें,
बाँट दे सब खुशियां और ग़म दफ़्न कर चलें। 

बाँटने से बढ़ती हैं खुशियां, मैंने सुना था,   
मिट जाते हैं ग़म, मेरी माँ ने था समझाया।   

अगर कुछ देना है तो खुशियां लौटा दो,
फरिश्ता बन जाओगे तुम, सब दुआएं कमा लो। 

अंधेरों ने ढूंढा है एक रोशन सितारा,  
चलो, हम भी बन जाए किसी आंख का तारा।
क्या पहचान है तुम्हारी

पूछो तो सही, क्या पहचान है तुम्हारी?
क्या तुम सिर्फ़ एक भावना हो, या कोई अधूरी कहानी?
बताओ तो सही, क्या तुम वक्त के मेहमान हो?
या वो जो वक्त को बदल दे… जानो तो सही।

सोचो तो सही, क्या तुम सिर्फ़ एक शरीर हो?
या वो ऊर्जा जो ब्रह्मांड को सींचे, हर लकीर हो!
समझो तो सही, तुम वो दीप हो जो अंधेरों को खा जाए,
हर रग में क्रांति है, जो संसार हिला जाए!

तुम एक अनंत संभावना हो, मानो तो सही!
तुम एक महाशक्ति हो, जानो तो सही!
तुम प्रकृति की श्रेष्ठ कृति हो, पहचानो तो सही!
जो जग को बदल दे, वो इंसान बनो तो सही!

मान लो, जान लो, सोच लो, सुन लो,
अब वक्त है खुद को चुन लो!
परिवार से शुरू कर, समाज तक ले चलो,
दुनिया को बदल दो, ये प्रण ले चलो!

उठा लो कुदाल, कर दो शुरुआत,
हर अंत में छुपी है नई शुरुआत!
यह पल आख़िरी नहीं, पहला बन जाएगा,
जब तुम खुद से मिलोगे — संसार मुस्कुराएगा।