दहेज प्रथा उन्मूलन दहेज प्रथा उन्मूलन वाले, गुप्ता जी PWD चीफ़ का पद संभालें, सेवाकाल में बेटी ब्याह लें समाज में अपनी साख बना लें। मंदिर गुरुद्वारे चढ़ावा चढ़ाएं, पुरोहितों से कुंडली मिलाएं, गुरुवार का व्रत रखवाएं, प्याज लहसुन घर ना आए। पत्नी रखे बुधवार का व्रत, बेटी शुक्र को अन्न न खाए, सेक्रेटरी उनका दारू न चढ़ाएं। शनि का व्रत ड्राइवर से रखवाएं। मंदिर घंटा नित्य बजाएं। भिखारी भी खाली हाथ न जाए। ब्राह्मणों को भोजन कराएं। विवाह कांड का पाठ कराएं। विशेष भक्ति का क्या है प्रयोजन, चीफ़ के पद का उपयुक्त नियोजन, संपन्न परिवार में बेटी जाए, विवाह कैशलेस हो जाए। 100 करोड़ के टेंडर की फाइल विधानसभा से चलकर आयल। टेबल टेबल होते-होते, चीफ़ की टेबल पर करती स्माइल। अफसर ड्यूटी पर हैं सारे सब ठेकेदार समर्पित हैं। गुप्ता पुत्री का स्वयंवर सभ्य समाज में चर्चित हैं। देखो भाग्य का खेल निराला ठेकेदार निकला कमिश्नर का साला सिफारशी फोन बड़े साहब का आला , गुप्ता जी ने प्रस्ताव रख डाला। गुप्ता जी की साख का मामला, कमिश्नर बाबू ने झट धो डाला। नुक्ताचीनी को लगाओ ताला, विवाह होगा कैशलेस वाला। भाग्य से ऐसा संयोग मिला है। लड़के को दहेज में टेंडर मिला है। लड़की है जैसे लक्ष्मी की जाई। दो परिवारों की किस्मत चमकाई, देखो भैया भूल न जाना। बच्चों को ठेकेदार बनाना। चीफ साहब के नित्य गुण गाना, कमिश्नर अंकल के पांव दबाना।
मेरी माई सपने में आई, दूधिया साड़ी, ज़रा मुस्कराई, कहना चाहती थी शायद कुछ, लेकिन कुछ भी बता न पाई। इक पल दिखी, ओझल हो गई, बादलों के पार, वैकुंठ में खो गई, कहना क्या था, पहेली हो गई, मेरे मुख को आँसुओं से धो गई। दुविधाओं की आड़ में गुज़रा जीवन, मुसीबतें आईं, छोटी पड़ी कद की लंबाई, चली अकेली संघर्ष पथ, कद से ऊँची छलाँग लगाई, धीरे धीरे सेहत गँवाई, वक्त से पहले बूढ़ी माई। महीना सितम्बर, साल उन्यासी, मुझे मिली, मेरी पहली कमाई, उस दिन का ठीक से याद है मुझको, जब वो रक़म मैंने माँ को थमाई। इतनी खुश, कि बावली हो आई, घर-घर जाके मिठाई बाँट आई, बेटा लाया है मेरा, पहली कमाई, बधाई हो, बधाई हो, बधाई हो, बधाई।
कहानी एक फ़कीर की कहानी एक फ़कीर की, बादशाह से कम नहीं, मानो मेरी बात सजन, हक़ीक़त है, वहम नहीं। खबरों में आता जाता है। रोज़ फ़ोटो खिंचवाता है। प्रश्नों से घबराता है, मन की बात सुनाता है। सद्गुणी संस्कारी है, वाक् चतुर व्यापारी है, रामराज्य प्रणेता है, मंजा हुआ अभिनेता है। संघ कुशल सिपाही है, छद्म कला परिपूर्ण है। साम दाम विमुख सदा, दंड भेद संपूर्ण है। पूंजी का साम्राज्य है, (अ)दानियों की संगत है। पर्दे के पीछे गुपचुप से, लेनदेन पारंगत है। भक्तों में श्रद्धा कम नहीं, विरोधियों में दम नहीं, न्यायालय अचंभित है, आलोचना प्रतिबंधित है। स्वार्थियों की पंगत है, सांसदों की संगत है। कुछ भी कहना सुनना कर लो, पक्षपात की रंगत है। भारतवर्ष का आम नागरिक दृष्टिकोण विभाजित है, जाति धर्म की उलझन में, सत्य सदा पराजित है। अपने घर में रोते हैं सब, महामानव अभिजीत है, ऐसा माया जाल बुना है, भय से सच्ची प्रीत है। अब युवा वर्ग की बारी है, संगठित नर और नारी है। भय का कोई भय नहीं है, कल के उत्तराधिकारी हैं। छोटी सी चिंगारी है, गर्भ में ज्वाला धारी है। जन्मेगा नवयुग का नायक, पाखण्ड की अंतिम पारी है।
शरीफ़ लोगों का गिरोह गिरोह शरीफ़ लोगों का, राम की कसमें खाते हैं, इतिहास के काले पन्नों को, अखंड भारत बताते हैं। शक्ल से भोले भाले हैं, शिवाजी के गुण गाते हैं, मूढ़ मति जन गण मन को, असंभव सपने दिखाते हैं। संस्कारों की बातें करते हैं, सत्य से कतराते हैं, अनपढ़ अक्षम भारत को, विश्व गुरु बताते हैं। खुलकर कभी नहीं लड़ते, षड्यंत्र कला पारंगत हैं, सत्ता तट समृद्धि है, स्वार्थियों की संगत है। इतिहास के विकृत रूप को, जनमानस में उगाते हैं, इस्लाम को खतरा बताते बताते। सत्ता का दांव लगाते हैं। कल की बातें करते थे। अब कल की बातें करते हैं, आज की जो करनी पड़े, तो हिंदू मुल्ला करते हैं। निम्न वर्ग के युवकों को, मौखिक सम्मान दिलाते हैं, उनके कंधों पर पाँव धर, ऊंची छलांग लगाते हैं। अपने ही मन की सुनते हैं, और लंबी लंबी कहते हैं, राम मन्दिर में चोरी पर, न कहते हैं, न सुनते हैं। पूरे उपमहाद्वीप को, अखंड भारत बताते हैं, धर्म निरपेक्ष सिद्धांत को, खुलेआम झुठलाते हैं। अब क्या होगा पता नहीं, क्या हो गया है, पता नहीं, भीड़ तंत्र के मध्य में भारत, खो गया है पता नहीं।
कालखंड का काला दिन आषाढ़ का महीना, दिवस रविवार है, दिल्ली की सड़कों पर आज, कैसा हाहाकार है। कायर बहरूपिए राजा ने, असली चेहरा दिखाया है, बेबस युवा छात्रों पर, सरकारी लट्ठ चलाया है। गलतफ़हमी है किसी की, कि सड़कें बरसात में भीगी हैं। खूनी आंसुओं का कोई सैलाब उमड़ के आया है। यह वहीं है जो रात दिन, राम की कसमें खाते हैं, भ्रष्ट अक्षम व्यवस्था को, परीक्षा तंत्र बताते हैं। बहुत अन्याय हुआ छात्रों पर, हठी-सत्याग्रही दंडित हैं। चुनकर जो लाए थे इनको, कर्तव्य विमूढ़, लज्जित हैं। कालखंड का काला दिन, याद रहेगा, रहेगा याद, ये रोता बिलखता हिंदुस्तान, भूलेगा दो दिन के बाद। राजा को यकीन है, कि दो दिन आंसू बहाएंगे, हिंदू-मुस्लिम मंदिर वाले, फिर लाइन में लग जाएंगे। घमंडी राजा का छद्म रूप, भीगी पलकों में चित्रित है, शक्ति दंभ का अंत समय, जन मानस में अंकित है।
कल्पवृक्ष आषाढ़ का महीना दिवस रविवार है। लाला राम कुमार को आज बारातियों का इंतजार है। जुलाई तेरह साल छयासी, कैसी है यह छाई उदासी, मां की लाडली किरण बेटी, आज हो रही पिया घर वासी। मां क्यों नजरें चुरा रही है, मिलने से भी कतरा रही है, बढ़ी हुई है दिल की धड़कन सूना हो जाएगा आंगन! अनिल किरण की अद्भुत जोड़ी, उम्र बढ़ी है थोड़ी-थोड़ी, साल चालीस पार हो गए, स्वयं ससुर और सास हो गए। साल चालीस जाते जाते, शुभ संदेश लाया है, अनिल-किरण प्रेमी युगल को दादा-दादी बनाया है। हर पल गुज़रे अतिशय सुंदर, शुभ कामना सबके मन में, सुख सागर हो जीवन हर पल, कल्पवृक्ष हो आँगन में।
हे प्रभु सुंदर हे प्रभु सुंदर, अनंत निरंतर, कण-कण में है तेरा वास, क्या मांगू मैं और प्रभु, सब कुछ तो है मेरे पास। काया में इक, रोग बसा है, और मैं कुंठित सदा उदास, घोर अँधेरा छाया मन में, तू है उज्ज्वल दीप्त प्रभास। बिन मांगे सब कुछ दिया, कैसे रखूँ एक और आस, दर-दर भटके रोगी काया, तू ही मेरा समग्र प्रयास। माना की ये रोग जटिल है, पर तू तो है कृपा निधान, मन मंदिर में घोर अँधेरा, कल की चिंता रहे प्रधान। काया कष्ट फिर सुगम है, मन का क्या करूँ भगवान, दूर करदे मन का अँधेरा, आस प्रकाशित दीप समान।
नई महाभारत नवभारत की नई महाभारत फिर से लिखी जा रही है, पात्र बदल गए हैं सारे पट कथा भी नई-नई है। पांडव हो गए अल्पसंख्यक, सत्ता कौरवों के हाथ लगी है, इन्द्रप्रस्थ में सजा सिंहासन, कृष्ण कहीं उपस्थित नहीं हैं। यूँ तो दृश्य सुंदर बहुत है, लेकिन देखने लायक नहीं है, मर्यादाओं में घिरा हो राजन, ये विधान में लिखा नहीं है। अनंत पाप किए हों उसनें, फिर भी वो बदनाम नहीं हैं, राजा अब अंधा नहीं है, प्रजा ही दृष्टिहीन हुई है। यूँ तो प्रजातंत्र है भारत, सर्वविदित संकल्प यही है, मर्यादाएं बिक जाए जब सब, न्याय अब निष्पक्ष नहीं है। भय का वातावरण व्याप्त है, सत्याग्रह प्रतिबंधित है, हठ विरोध की न्याय याचिका, न्यायालय में लंबित है। शकुनि विभीषण एक हो गए, असत्य महिमा मंडित है, जन समूह में आंदोलनकारी, विविध विधान से दंडित हैं। विभक्त समाज के बुद्धिजीवी, विस्मृत चिंतित खड़े हुए हैं, मान्यताओं के जंगल में, हतोत्साहित डरे हुए हैं। अब कौन चलाएगा, राष्ट्र बंधुत्व का ये अभियान, भयमुक्त हो लौटाए जो, भ्रमित समाज का आत्मसम्मान।
द्रौपदी की न्याय याचिका न्याय देवी की आंखों पर, जाने कब से पट्टी बंधी है, डगमगाता तराज़ू लेकर, सुनसान राह मायूस खड़ी है। संविधान की पोथी भी, जो ले रखी थी हाथों में, कुतर गए चूहे पन्नों को, अब कहीं पर दबी पड़ी है। आंखों पर पट्टी बांध देवी, गांधारी से प्रेरित है, अंतहीन महाभारत है, लज्जित सिर झुकाए खड़ी है। अंधे युग का पुनरागमन, न्यायालय विकलांग हुए हैं, द्रौपदी की न्याय याचिका आज भी लंबित पड़ी है। अंधे राजा का मंत्री मंडल विद्वानों से विभूषित है। निरंकुश पुत्रों की शिकायतें राज दरबार में भरी पड़ी है। गांधारी की एक प्रतिज्ञा महा नाश का सूतक है। महा युद्ध के फल स्वरुप, स्वयं न्यायालय में खड़ी है। युगों युगों से जीवित है महाभारत की अनंत कथाएं। आंखों पर पट्टी अन्यौचित है, अश्रुओं से भीगी पड़ी है।
दीनू बेलदार और शिवालय ऐसा क्या करूँ कि कुछ ऐसा हो जाए, दीनू बेलदार के हाथों की लकीरें बदल जाएं। जी-तोड़ मजदूरी करे, फिर जो भूखा सो जाए, जीवन बदलने की आशाएं धूमिल हो जाएं। छोड़ो कल की, आज बस काम मिल जाए, दो वक्त की रोटी का रोज़गार हो जाए। स्वाभिमानी है, भले कुछ भी हो जाए, भीख माँगने को वो हाथ कभी न उठ पाए। दिन गुज़रे उसके हाथों की लकीरें वहीं हैं, भूख की लड़ाई में कभी हार जीत हो जाए। उसके घर से बाज़ार तक शिवालय बहुत हैं, पत्थरों के दरबार में उम्मीदें संजो आए। इतनी ठोकरें खाई हैं हर मंदिर-देवालय में, कोई पथरीली उम्मीद, चूल्हा न जला पाए। दीनू बेलदार का भाग्य जैसे पुश्तैनी है, चमका कब था, जो आज मैला हो जाए। पाँच साल गया वो किसी विद्यालय में, पिता ने कहा—“रोज़ी-रोटी एक और हो जाए।” घर से दूर विद्यालय तक शिवालय बहुत थे, पुस्तकें छूटीं, कि भूख से लड़ाई तेज़ हो जाए। क्या कहूँ, कि मैं कोई विधि विधाता नहीं हूँ, पर क्यों न हर शिवालय ही विद्यालय हो जाए। शिवालय से विद्यालय का अभियान हो जाए, भक्ति का विधान, ज्ञान अनुष्ठान हो जाए। दीनू के बच्चे पढ़-लिखकर विद्वान हो जाएं, शिवालय से ग़रीबी का समाधान हो जाए।
एक शब्द सनातन एक शब्द सनातन है, खींचा मेरा सारा ध्यान, खोजूं इसका अर्थ निरंतर, पुराण और भाषा विज्ञान। सत्य यदि सनातन है, असत्य की क्या पहचान, प्रेम यदि सनातन है, द्वेष का कैसा सम्मान? सुकर्म दुष्कर्म दोनों भाई, एक दूजे से इनका भान, अहिंसा रही पल दो पल, हिंसा हुई शक्ति प्रमाण। नव समाज हुआ उत्थान, गुरु हुए स्वार्थ प्रधान, परिभाषाएं बदली सारी, कर्म बल ना रहा महान। देव कथाओं में उलझे मन, अर्थों का विकृत गुणगान, कर्म पथ से भटक गया, मूढ़ मति होती बलवान। किस भाव से प्रेरित है? सनातन समाज का उत्थान, सत्यनिष्ठा भ्रष्ट हो रही, कैसे हो जन मन कल्याण?
रंगों से लिपटने का त्योहार जश्न-ए-दोस्ती का रंग है, मौका भी है, त्योहार भी, चले आएंगे होली के मतवाले, संग बिछड़े यार भी। आइए, अपने दोस्तों को भी साथ बुला लाइए, गुलाली चेहरों से मिलिए, मुंह भी मीठा करते जाइए। कल शाम हमने मिलकर होली जो जलाई, ख़ाक हुई हर रंजिश, रुसवाई, और बेवफाई। गए साल जो एक लाला जी के चेहरे की हुई पुताई, लाल-पीले हो गए जनाब, मची दुहाई पर दुहाई। बुरा मान गए थे पहले, वजह देर से समझ आई, चार गिलास भांग पी ली, तो चेहरे पर हंसी आई। रंगों से लिपटने का त्योहार आया एक साल के बाद, बुरा न मानो होली है — दोस्ती ज़िंदाबाद, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद।
काम देव की कमान काम देव की कमान से निकला, तीर प्रेम का पश्चिम में। उत्तर दिशा में मिला शिवम को, आकर्षण के उत्सव में। प्रेम के पथ पर, चंचल मन से, आशाओं के विस्तृत पल में। बांध गया प्रेमी युगल को, जनम जनम के बन्धन में। दूसर माह की दशम तिथि, जब जब कैलेंडर पर छाएगी। संस्कारों के मधुर मिलन को, और सशक्त कर जाएगी। सदा फलित संकल्प तुम्हारा, देवताओं का निर्णय हो। ये कविता समर्पित तुमको, परम आनंद का उद्गम हो।
गौ माता की पूजा वो सब जो गाय को गौ माता बताते हैं, दोगले हैं, सच बोलने से घबराते हैं। सच बताओ गाय अगर गौ माता है, तो नवजात बछड़ा किसका भ्राता है, कायर है सब सच सुनने से कतराते हैं। तर्क हीन हो, पौराणिक कथाएं सुनाते हैं। देखना, नवजात शावक का नर या मादा होना, मुंह बोले भक्तों द्वारा, बच्चों की हत्या होना। कितना मुश्किल है गौ माता का, माता होना, मानव समाज की भोगेच्छा को गर्भ में ढोना। घायल देह, दर-दर भटकना बेघर होना, अच्छा है मर जाना, किसी का भोजन होना। ईश्वरीय दंड है, गाय योनि में जन्म होना, भक्तों का खिलौना, मंदिरों में स्थापित होना। जो गौ माता की पूजा ध्यान करते हैं, अपनी माता का ही दुग्धपान करते हैं।
यह कविता समर्पित तुमको पहले माह का अंतिम दिन, दो हज़ार में आठ थे कम, थामा हाथ, एक दूजे का, साथ रहें हम जनम जनम। अदृश्य बंधन का धागा है, हम दोनों के बीच सनम, प्रतिवर्ष गिरह लग जाती है, चौंतीस हुई पर लगती कम। एक हो गए तन मन धन से, सुंदर सुखद सुहाना संगम, तुम चलो मेरे पथ प्रियतम, मैं तुम्हारे कदम कदम, यह कविता समर्पित तुमको, सहित प्रेम उद्गार परम, नई गिरह की बधाई तुमको, बीते हर पल अति से उत्तम।
नारी शक्ति का उदय राम रावण युद्ध में भैया किसने किया था भीतर वार, शक्तिशाली रावण की सेना, जीते रघुकुल राजकुमार। लंका युद्ध समाप्त हुआ और लौटी सीता मैया, इसके आगे क्या हुआ, सुनो ध्यान से भैया। विभीषण विरजे सिंहासन पर, प्रजा ने अस्वीकार किया, लंकापति हों रावण भ्राता, जन जन ने प्रतिकार किया। प्रजा चली आंदोलन पथ पर, एकल स्वर हुंकार किया, यूं ना चले लंका का शासन जो राक्षस कुल का नाश किया। सेना बल था क्षीण हो चुका राजकोष था खाली, विडंबना में घिर गए राजन, कहुं विधि चली राज्य प्रणाली। जन विद्रोह का दमन करें तो होगा, अनुचित अत्याचार! लंकेश पद का त्याग करें, या युतिगत विमर्श विचार, जनमानस जो अति विक्षिप्त था, ऐसा नरसंहार हुआ, जीवित थे महिलाएं और बच्चे घर घर में अवसाद हुआ। चिंतित राक्षस राजन ने अगस्त मुनि का ध्यान किया, जनाक्रोश की कथा सुनाई दैविक निर्णय का आह्वान किया। सुना ध्यान से ऋषिवर ने, फिर कुछ पल विश्राम किया। पास बुलाया राजन को, दैविक निर्णय का व्याख्यान किया। राक्षस वंश का ध्वंस नियत था, सीता माता ने श्राप दिया। लेकिन कुल जननी माता को दैविक श्राप से मुक्त किया। दिव्य दृष्टि से देखा मैंने, नारी शक्ति का उदय अहो, दैविक इच्छा है लंका में मंदोदरी का शासन हो। यही एक युक्ती है, प्रिय राजन, सिंहासन का त्याग करो। मंदोदरी को शासन सौंपो, राजकाज में मदद करो।
विधायकनमा - हिदायतनामा मुबारक हो संतराम, तुम्हारी तरक़्क़ी हो गई, लड़े ख़ूब, बने विधायक, आमदनी पक्की हो गई। कुछ हिदायतें हैं ज़रूरी, चाहे गाँठ बाँध लो, हो के संतराम बाहर से, गब्बर को बदनाम होने दो। डकैती का काम औरों को सिखाओ, ग़रीबी दूर कर दो, तुम्हारा शुक्राना ऊपर तक पहुँचे, पुख़्ता इंतज़ाम कर लो। तुम्हारे इलाक़े की सब करामातें, होंगी तुम पर क़ुर्बान, ख़ुद चले आएँगे मुबारक देने—चमचे, पट्ठे और पहलवान। तुम्हारी शख़्सियत में हैं दो किरदार, एहतियात रखना, गरीबों के संतराम, और अमीरों के लिए गब्बर बने रहना। तुम्हारे इलाक़े में सरकारी ख़र्च, तुम्हारी मर्ज़ी से होगा, ठेकेदार कोई भी हो, हिस्सा सबका बराबर होगा। ठेकेदारी की हिस्सेदारी के हक़दार चार होंगे, मैं, तुम, पार्टी और बाक़ी सरकारी बाबू के होंगे। अगर चाहते हो इस ओहदे पर बने रहना, बाबाओं और भजन मंडली का जाप करते रहना। अख़बारी ख़बरचियों को ख़बर से दूर रखना, ग़र होने लगे बदनामी, तो मुझे याद करना। कुर्सी पर टिके रहना है, तो नसीहत याद रखना, भीड़ से हाथ जोड़कर मिलना, ख़बरों से दूर रहना।
छोटा सा आंगन देहरादून के आंचल में एक छोटा सा आंगन आप की रौनक से, दुआओं से सजता है, ये छोटा सा आंगन। जश्ने डिनर हो या जश्ने बर्थडे, आपकी शान की ख़ातिर में, पूरे जोश में हाज़िर है, ये छोटा सा आंगन। राज़ की बात थी जो अब तलक छुपी हुई, जश्ने ज़ायके में, मसालों की बारात शामिल हुई । हुक्म करें, क्या पेश करें? पहले कुछ नमकीन, फिर कुछ और, फिर कुछ मीठा हो जाए। के ये शाम बेतकल्लुफ़, बेमिसाल हो जाए। दोस्ती का वादा है हमारा, निभाएंगे, हर रोज, हर पल लौट के आईये, सब के साथ आईये, हम तैयार हैं, रहेंगे, आज, अभी और कल।
ये नया साल कैलेंडर के पन्ने पलटे जाएंगे, बदले जाएंगे, के आ गया है, ये नया साल। नई उम्मीदें और कसमें जो खाई थी, पूरे हुई ना हुई, के आ गया है, ये नया साल। और जाने कुछ हो ना हो, सालगिरह में, एक और गिरह लगा जाएगा, ये नया साल। ये वक्त जो रुकता नहीं, अच्छा बुरा होता नहीं , अपना असर दिखा जाएगा, ये नया साल, लेना देना बराबर, भूल चूक माफ़ करना, के पूरा हिसाब मांगेगा, ये नया साल। जुबां पे मिसरी रख ले, कर ले तेवर ढीले, के मीठा गुजरेगा, ये नया साल। यह वक्त क्या है, कुछ पता नहीं, परवरदिगार का पैमाना है, ये नया साल। अपनी दुआओं में करलो सब को शामिल, के अच्छा गुज़रेगा, ये नया साल।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा पत्ता पत्ता बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने हैं, जाने न जाने तू ही न जाने, गांव तो सारा माने है, झूठ से नफरत है, मुझे ये यह राज़ सब कोई जाने है, पर मैं कभी सच ना बोलूं, अमीरों का दामन न छोडूं, यह बात कोई ना माने है, पत्ता पत्ता बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने है, जाने ना जाने, तू ही ना जाने, शहर तो सारा माने है, ताकत के इम्तेहां में अव्वल सदा मैं आता हूं यार, ये दुनिया क्यों आंसू बहाए, विरोधी नारे लगाऐं, पर तू क्यों बुरा अब माने है, पत्ता पत्ता, बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने हैं, जाने न जाने, तू ही न जाने, रियासत तो सारी माने है, मेरे कुछ दोस्त है जो मेरे काम आए तुम्हें क्या पता, ज़माने के दुश्मन क्या जानें, वफादारी ना पहचाने, मायने कुछ और कयूं निकाले हैं, पत्ता पत्ता बूटा बूटा, राज़ हमारा जाने हैं, जाने ना जाने तू ही ना जाने, देश तो सारा माने है।
जवाब धन्यवाद भाई साहब, आपने कुछ सोचा तो लिखा, और वही लिखा, जो आपको टीवी पर दिखा। आपने लिखा है, तो ज़रूर कुछ सोचा होगा, जीवन विकट है, आपने भी भोगा होगा। आओ मेरे गांव में, और देखो मेरा हाल, दो वक्त की रोटी तो क्या, पानी भी है मुहाल। सच कहा है आपने, कि सियासत एक बाज़ार है, और मेरे जैसा, गरीब का बेटा, बिकने को तैयार है। मैं याद करा दूं, कि ये व्यवस्था मैंने नहीं रचाई, कुछ सेठों नेताओं ने मिलकर, मेरी थाली की बोली लगाई। मैं आपके जैसा पढ़ा लिखा, धनवान तो नहीं, तो क्या मैं सीधा-सीधा, गरीब इंसान भी नहीं? बिकना तो मेरी नियति है, कि जीना है मुझे, इसी बाज़ार में एक ज़हर है, रोज़ पीना है मुझे। आपका दिलचस्प खेल, हमारा त्यौहार होता है, खरीदने बेचने, बिकने और बिकवाने का रोज़गार होता है। बड़ा मज़ा आता है जब यह बाज़ार सजता है, चंदू हलवाई और दीनू नाई का वाजिब दाम लगता है। यह त्यौहार कुछ-कुछ दिवाली जैसा है, जब अमीरों के घर में दिया और गरीब के चूल्हा जलता है। फ़र्क सिर्फ इतना है, कि आपको फ़र्क नहीं पड़ता, कि आप के रंगीन चश्मे में, मैं दिखाई नहीं पड़ता। समझदार हो आप, मेरी बात ना परखो, दो दिन भूखे सो जाओ, चिट्ठी दुबारा लिखो।
मुझ पर देवी की कृपा है हेलो भाई साहब, माय-सेल्फ सर्व विषय गुरु ज्ञानी, एम ए, बी ए, पी ए, डी ए, सब विषय हम जानी। मैं था सर्व-प्रतिभाशाली, पर यह बात कोई ना मानी, तब हमारे पार्टी प्रमुख ने हमारी योग्यता पहचानी। ताकत झंडा पार्टी का, मैं अधिकारिक प्रवक्ता, विषय बहस का कोई भी हो, मैं पीछे नहीं हटता। पार्टी ने हर बात थी जो, मेरे मुख से कहलवानी, काम बहुत कठिन रहा, पर मैंने हार न मानी। इंग्लिश, हिंदी, भूगोल, साहित्य, या देवताओं की वाणी, गूगल-शूगल, एआई, जीआई ने दूर कर दी परेशानी। विरोधियों का विरोध करूँ, और प्रेस से वार्तालाप, दो शब्द के विषय का, कर दूँ सारा दिन आलाप। भगवा यूनिफॉर्म में देखो, मेरा आत्म-विश्वास, मेरे कॉम्पिटिटरों ने झट से, ले लिया सन्यास। दुष्ट पत्रकारों को दिया गया है, एक स्पष्ट आदेश, उल्टे प्रश्न करें अगर, तो नौकरी रहे ना शेष। मुझ पर देवी की कृपा है, राष्ट्रभक्ति है नारा, मेरे चेले बन जाओ सब, मौका मिले ना दोबारा।
एक रौशन सितारा अंधेरों ने ढूंढा है एक रौशन सितारा, चलो, हम भी बन जाए किसी आंख का तारा। विरानियों में पा लिया एक जश्ने बहारा, चलो, तुम भी बन जाओ एक उम्मीद का सहारा। जाते हुए घर बाँट दो खुशियां बराबर, आते हुए मिल जाएंगी वापस वह बढ़कर! कुदरत का है दस्तूर, चलो, क्यों ऐसा न करें, बाँट दे सब खुशियां और ग़म दफ़्न कर चलें। बाँटने से बढ़ती हैं खुशियां, मैंने सुना था, मिट जाते हैं ग़म, मेरी माँ ने था समझाया। अगर कुछ देना है तो खुशियां लौटा दो, फरिश्ता बन जाओगे तुम, सब दुआएं कमा लो। अंधेरों ने ढूंढा है एक रोशन सितारा, चलो, हम भी बन जाए किसी आंख का तारा।
क्या पहचान है तुम्हारी पूछो तो सही, क्या पहचान है तुम्हारी? क्या तुम सिर्फ़ एक भावना हो, या कोई अधूरी कहानी? बताओ तो सही, क्या तुम वक्त के मेहमान हो? या वो जो वक्त को बदल दे… जानो तो सही। सोचो तो सही, क्या तुम सिर्फ़ एक शरीर हो? या वो ऊर्जा जो ब्रह्मांड को सींचे, हर लकीर हो! समझो तो सही, तुम वो दीप हो जो अंधेरों को खा जाए, हर रग में क्रांति है, जो संसार हिला जाए! तुम एक अनंत संभावना हो, मानो तो सही! तुम एक महाशक्ति हो, जानो तो सही! तुम प्रकृति की श्रेष्ठ कृति हो, पहचानो तो सही! जो जग को बदल दे, वो इंसान बनो तो सही! मान लो, जान लो, सोच लो, सुन लो, अब वक्त है खुद को चुन लो! परिवार से शुरू कर, समाज तक ले चलो, दुनिया को बदल दो, ये प्रण ले चलो! उठा लो कुदाल, कर दो शुरुआत, हर अंत में छुपी है नई शुरुआत! यह पल आख़िरी नहीं, पहला बन जाएगा, जब तुम खुद से मिलोगे — संसार मुस्कुराएगा।