मेरी प्राइवेट आत्मकथा

मेरी प्राइवेट आत्मकथा और चंगू मंगू! साल 2020 और मैं साठ का हो गया। कोविड भी इसी साल आया और 2021 में चला भी गया।
 जाते जाते मुझे एक प्राइवेट वायरस दे गया और शुरू कर गया मेरी लेखन यात्रा। 
जब मुझे यह एहसास हो गया की कहानी लिख सकता हूं तो एक और विषाणु मेरे मानस पटल पर छा गया। 
हम किसी से कम नहीं। तो यह तड़प शुरू हुई कि आपनी कहानी किसे सुनाऊं, तब तक यह बात सिद्ध हो चुकी थी 
कि मेरे आलोचक मेरे घर पर ही है। उनके पास मेरी कोरी कहानियों को सुनने का समय नहीं और किसी 
तरीके से सुना भी दूं तो प्रतिक्रिया इतनी ठंडी कि उससे टैलेंट की कुल्फी जमालूं और उसे चाट कर सो जाऊं। 
यह तो मुझे बिल्कुल मंजूर नहीं था। 
अतः मैंने साहित्य के इतिहास में डुबकी लगाई गूगल पर खुदाई कर डाली कि वह कौन से महापुरुष थे जो 
लिखते तो थे पर काव्यों को सुनाने के मोह से परे फ़ाका मस्ती में जीते थे। 

जब गूगल ने सरेंडर कर दिया तो एआई की मदद ली कि भाई तुम तो सर्वज्ञानी हो, अंतर्यामी हो, तुम ही कुछ बताओ। 
तो कुछ नाम सामने आए एक मिर्ज़ा गालिब और दूसरे चंगू मंगू!

चंगू मंगू सगे दोस्त थे और बेकार रहते हुए भी मस्ती में रहते थे। उन्होंने अपने फाकों का इंतजाम कुछ इस तरीके से 
कर रखा था। मुशायरों में कवि सम्मेलनों में जाते थे और वाह-वाह लुटाते थे। 
बस उन्हें समझो तो फ़ाके का इलाज मिल गया था। जब भी फ़ाके की नौबत आने लगती किसी शायर कवि या 
लेखक के घर चले जाते हैं और उनके नीरस शेरों कविताओं और कहानियों पर वाह वाह लुटा आते।
 एक वक्त का चाय नाश्ता और कभी-कभी भरपेट भोजन मिल जाता था। 

यह प्रयोग कामयाब रहा और धीरे-धीरे सारा शहर उन्हें जानने लगा। जब भी कोई कवि शायर या 
लेखक कुछ नया लिखता चंगू मंगू को घर बुला लेता और वाह-वाह लूट लेता। शायर को तसल्ली 
मिल जाती और चंगू मंगू को एक वक्त का खाना। 
पर यह बात भूल ही नहीं चाहिए कि मिर्जा गालिब भी मकबूल होने से पहले चंगू मंगू की सेवाएं लेते थे। 
मिर्जा गालिब एक शेर में अपनी फाका मस्ती कुछ इस तरह से बयान कर गए हैं।

कर्ज की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हां रंग 
लाएगी हमारी फाका मस्ती एक दिन।

 इससे यह सिद्ध होता है कि मिर्जा गालिब की फाका मस्ती और चंगू मंगू की फाका मस्ती एक जैसी नहीं थी
 कि मिर्जा गालिब अपनी फ़ाक़ा का मस्ती का सारा श्रेय कर्ज में पीने वाली शराब को दे गए हैं। 
पिछले 4 साल से मैं चंगू मंगू को ढूंढ रहा हूं। आज मैं  चंगू मंगू को ढूंढने निकला हूं, 
कहीं आप में से कोई चँगू मंगू निकाल आए। यदि आपको कहीं मिल जाएं तो उन्हें बता देना कि 
अजय सभरवाल उन्हें ढूंढ रहा है। तुरंत संपर्क करें