ग़ुलाम नहीं है हिन्दुस्तान इस मुल्क की हालिया तस्वीर किसनें है बनाई, यही है वो बात जो मुझे कुछ ऐसे समझ आई, मुफ़लिसी की ज़मीन पर नासमझी के फूल खिलते हैं, इसी गुलिस्तान में जहालत के पैबंद मिलते हैं। जहालत के बाज़ार में दीवानगी मुफ़्त मिलती है। तब जाकर किसी कौम की पहचान बनती है। इस क़ौम से एक मुख्तियार निकल के आता है। जहन्नुम और जन्नत का फ़र्क समझाता है। ख़ुद को मुंसिफ तो कभी मसीहा बताता है। मुफ़लिसी को मज़हब का आईना दिखाता है। इस हुजूम से निकल ना पाए कोई, ऐसा जाल बिछाता है, मासूम इंसानो को ग़ुलामी की राह पे ले जाता है, जम्हूरियत के कायदे का सामान हो जाता है, यही हजूम मुल्क़ का मुस्तक़बिल बनाता है। ये बात मुझे फिर भी समझ नहीं आती है, कैसे आज़ादी को ग़ुलामी रास आती है। के एक क़ैद परिंदा भी आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है, कैसे एक मुफ़लिस ग़ुलामी में सकून पाता है। कौन कहता है के आज़ाद हो गया हिन्दुस्तान, कैसे मान लूं के ग़ुलाम नहीं है हिन्दुस्तान।
हाक़िम शौक़िया बुज़दिल है जुम्मन चचा के झोंपड़े पे बुलडोज़र चल गया, बहुत रोया, चिल्लाया — पर कोई नहीं बचाने आया। मैं भी था एक चश्मदीद, हिम्मत मैं भी नहीं कर पाया, सरकारी लश्कर लौटा तो, क़रीब गया… समझाया। दो-दो गुनाह किए हैं तुमने — कौन है तुम्हें बताने वाला? वो क़ातिल ही तुम्हारा मुनसिफ़ है, कोई नहीं दरियाफ़्त सुनने वाला। अपना मज़हब पहन के चलते हो, चालाक है तुम्हें सताने वाला। दूसरा गुनाह तो ग़रीबी है, कोई नहीं आँसू पोंछने वाला। हाक़िम शौक़िया बुज़दिल है, तुम पे रहम नहीं करने वाला। मज़हब आलमी ख़तरा है, कोई नहीं तुम्हें समझाने वाला। संभलो के समझ जाओ — मज़हबी ज़हर फ़िज़ां में शामिल है। साँस लेना… यूँ भी मुश्किल है, ढूँढ लो कोई क़ब्र खोदने वाला।
इक बोसे का फ़ासला कायम है उस अफसाने का क्या कहूँ जो क़िताबों में सिमट जाए, उस उल्फ़त का क्या कहूँ जो रिवायतों में उलझ जाए। उन खयालात का क्या कहूँ, जो जज़्बात में बह जाएं, उस मुसाफ़िर का क्या कहूँ, जो मंज़िल से भटक जाए। मेरे अहसास कलम से होकर नज़्म हुए जाते हैं, के दिलबर की इक मुस्कान पे कुर्बान हुए जाते हैं। लिखता कहाँ हूँ यार, के मैं ख़ुद को बयाँ करता हूँ, हर एक अल्फ़ाज़ में अपना वजूद रवाँ करता हूँ। मेरे तसव्वुर में उसकी तस्वीर जवाँ हुई जाती है, नज़्म के आईने में देख ख़ुद को ग़ुलाबी हुई जाती है। इक बोसे का फ़ासला कायम है हमारे बीच, अनकही शिद्दत में एक उम्र गुज़री जाती है। मेरी आह को दिलबर तक पहुंचा दे कोई, के ये दास्तान भी मायूसियों में दफ़न हुई जाती है।
गब्बर वो बदनाम किरदार गब्बर वो बदनाम किरदार कैद में रहा जो बारह साल, कैद से छूटा तो क्या हुआ, किस्सा है बेमिसाल। मालाएं पहनाई नारे लगाए चेहरे आवाज़े नामुराद, गब्बर भाई गरीबों के मसीहा ज़िंदाबाद, ज़ि दाबाद। एक शख्स नजदीक आया, पैर छुए कान, में बुदबुदाया, ताकत झंडा पार्टी के, सरबरा ने है तुम्हें बुलाया, देखो गब्बर भाई, यह तो है, जम्हूरियत की दरकार, ताक़त झंडा पार्टी की टिकट पे तुम बनो उम्मीदवार। यूं तो टिकट चाहने वालों की कोई कमी नहीं। तुम्हारे जैसा तजुर्बा और क़िरदार किसी के पास नहीं। एक छोटी सी नसीहत लेलो, अपना नाम बदल लो, पहनो उजले कपड़े और नाम संतराम रख लो। हाथ जोड़े तुम्हारी तस्वीर, पोस्टर पर छपवा देंगे। गली-गली तुम्हारी तारीफ़ की मुनादी करवा देंगे। चार चार बाहुबली हैं, इस बार मैदान में, तुम्हारे आगे बौने हैं सब, समझ लो इत्मीनान से। बस एक महीना वही करो जैसा मैं कहता हूं। दस साल मैं जेल मे रहा,छाती ठोक के कहता हूं। हफ्ते में दो दिन भजन मंडली, दो दिन मुलाकातें, दो दिन है भाषण देना, देखो हम कैसा इंतजाम करवाते। बस थोड़ी सी मेहनत कर लो,बन जाओ तुम नेता , खुद चलकर घर आएं तुम्हारे,जनता, नेता और अभिनेता। यह मौका कहीं छूट ना जाए, इतनी बात समझ लो। पुलिस दरोगा पांव दबाएं जाने कुछ भी कर लो। नतीजा जब निकला जो भैया कैसी है हैरानी, संतराम बन गया विधायक, बिल्कुल सच है कहानी।
मुफ़लिसी में मोहब्बत मुर्दाबाद तुम्हारा ख़त मिला तुम्हारी लफ्ज़ बाज़ी पे मैं वारी जाऊं, या तुम्हारे अश्कों के सैलाब में डूब के मर जाऊं। मेरी खातिर मजनूं होकर तुम जान भी दे सकते हो, किसी और की न हो जाऊं, इस पर ख़ून भी कर सकते हो। खुदकुशी की धमकी देकर, मोहब्बत की कसमें खाने वाली, बातें बहुत रंगीन है, पर मैं नहीं इन में फंसने वाली। ये ख़त तुमने अपने ख़ून से लिखा, मैं नहीं मानने वाली, जो गलती मेरी अम्मी ने की, मैं नहीं दोहराने वाली। दरोगा की बेटी, मेरी अम्मी, इश्क में वो धोखा खाया, ससुराल में था मुफलिसी का आलम, अब तक है जो छाया। यूं तो मुझे पसंद हो और देखने में भी अच्छे भाले, पर जेब से कच्चे हो, नादान, अंजान, उधारी वाले, वो चांदी का छल्ला, जो तुम ने दिलवाया, ले के उधार पैसे, तुम्हारा दोस्त बिल्लू, है मेरे पीछे, के लौटाए नहीं मैंने जैसे, राज़ पर पर्दा उठा गया, हमारा, मेरी अम्मी की हाज़री में, मेरा भाई है पहरेदारी में, के शक है उसे मेरी किरदार दारी में। यूं करो, के हासिल करो, एक सरकारी शराफ़त नामा, साथ में पेश करो अपनी आमदनी का सबूत और गवाह नामा। यूं न चल पाएगा, इस तरह से तुम्हारा अश्क नामा, मैं भी समझदार हूं, के ढूंढूं कोई, रईस, दिलबर इश्क नामा।
गिरफ़्तार हिंदुस्तान क्या हुआ जब मुल्क यह आज़ाद हो चला, इंसानियत का कत्ल सरेआम हो चला। जिन्न जो के कैद था जहालत की बोतल में। जिन्नाह हो चला के जब आज़ाद हो चला। बर्बाद यूं हुआ के हिजरे वतन हो चला, आबाद यूं हुआ के फिर ग़ुलाम हो चला। आज़ादी का जश्न था जो रात भर चला, सुबह जो हुई के फिर वीरान हो चला। बंटवारों का सिलसिला रुका था कब कहां, जात पात नस्ल का आईन हो चला, तिजारते ख़ौफ़ अब सरे बाज़ार हो चला, हाक़िम के हाथ इक नया औज़ार हो चला। मज़हबी ऊंच नीच में तक़सीम गुलिस्तान, जहालत की बोतल में फिर गिरफ़्तार हिंदुस्तान।।
एक-नन्ही-किलकारी ज़हन के आईने में एक अक्स उभर के आता था। कभी सपनों में, तो कभी मेरे कानों में गुनगुना जाता था। कौन खेल रहा आंख मिचौली ये समझ नहीं पाता था, कानी आंख से ढूंढता था, पर नज़र नहीं आता था। फिर ख़बर मिली कि, है कोई नन्हा फरिश्ता आने वाला। सचमुच खेलेगा आंगन में, मुझे एक सीढ़ी ऊपर चढ़ाने वाला । बरसों बीत गए के दुआओं भरी एक उम्र गुज़री जाती है, एक नन्ही किलकारी सारी पशोपेश छीन के ले जाती है। अब ख़ुदा मुझसे कहे की मांग ले मन्नत कोई, मैं तो मांगू कुछ नहीं, कि इसके आगे भी है जन्नत कोई? मांगना मेरी फितरत नहीं के मिला है सब कुछ ऐसे, खुशियां बरसी हैं मेरे आंगन में, बरसात का मौसम हो जैसे।
हिंदू ईसाई या मुसलमान यूं भी देखा है मेरी नज़रों ने, के आज़ादी जब जवान हो जाए, उसे छेड़ने वाले बेहिसाब हो जाते हैं। आज़ादी जब आवारा हो जाए, इज़्ज़त लूटने वाले भी इज़्ज़तदार हो जाते हैं। आज़ादी जब बेज़ुबान हो जाए, क़ौमी शहीद दुश्मन-ए-आवाम बतलाए जाते हैं। आज़ादी जब हाक़िम की ग़ुलाम हो जाए, कत्ल-ए-आम खुलेआम हो जाते हैं। आज़ादी का जब सौदा होने लगे, दौलतमंद गुनाहगार, रसूख़दार हो जाते हैं। आज़ादी जब क़ैद कर दी जाए, अदालतें सजती हैं, गवाह ख़ुद गुमशुदा हो जाते हैं। ख़ूब देखा है इंसान की फ़ितरत को— आज़ाद हैं जब तलक़ बच्चे हैं। फिर जब क़ौम के लायक़ हो जाते हैं, हिंदू, ईसाई या मुसलमान हो जाते हैं।
मेरी कमज़र्फ हकीकत अजीब सानिहा मुझ पर गुजर गया यारो, मेरा हमशक्ल मुझे आइना दिखा गया यारो। हमराज़ था मेरा हर पल की ख़बर थी उसको, मेरे ज़हन में क्या चल रहा वो भी पता था उसको। हैरानगी की बात है कि देर रात के बाद आया, चोरी से घुसा, बेख़ौफ़, बे खटका, बेपरवाह आया। छुआ मुझे नींद मे, के झकझोर के उठाया उसने, मेरी कमज़र्फ शख्सियत को सरे आईना बिठाया उसने। देख गौर से कि बदशक्ल हो चली है सीरत तेरी, जाने कैसे झूठ बोले है, दग़ाबाज़ है शोहरत तेरी। छुपा सकते हो मेरी नज़रों से, हक़ीक़त कब तक, अपनी नज़रों से भी छुपाओगे ख़ुद को कब तक। क्या कहेगा, के कौन आया था तुझे मिलने वाला, जा सो जा, फिर से, के मैं लौट के नहीं आने वाला।
अल्फ़ाज़ यूं खिलने लगे अजीब हैं ये वक्त की रंगीन हरकतें, के अल्फ़ाज़ यूं खिलने लगे जो ज़हने चमन में। परछाइयों का कद जो था लंबा हो चला, कि सांझ थी, ढलने लगी तारीख़ ए उम्र में। उल्फ़त की रंगीनियों के सिलसिले हुए, काग़ज़ कलम शामिल हुए इस जश्न ए अदब में। बेनाम हसीनाओं के ख़त आने जो लगे, बे क़रार ख़्वाब भी यूं नाचने लगे। अब ये दुआ है के उम्रे दराज़ हो जाए, किसी हसीना से मुलाक़ात हो जाए। हद से गुज़र जाए और बदनाम हो जाए, उलझन भरे अफ़साने का आग़ाज़ हो जाए।
झूठी ख़बर एक मशहूर शायर की मौत का पैग़ाम आया, फ़ौरन ताज़ियत-नामा लिखवाया, कर दिया शाया। घर से निकला कि जनाज़े में शामिल हो आऊँ, गुज़रे दोस्त को आख़िरी सफ़र में कंधा दे आऊँ। गली के कोने पहुँचा ही था कि एक और पैग़ाम आया, झूठी थी फौत की ख़बर—माफ़ीनामा करो, शाया। चलो कोई बात नहीं, सलामत है ना गुज़रा शायर, ज़रूर किसी मनचले ख़बरी ने की होगी शरारत। चंद रोज़ गुज़रे, के एक पैग़ाम और आया, गुज़र गया न गुज़रा शायर—ताज़ियत-नामा फिर करो शाया। कुछ सोच में पड़ गया हूँ—या रब, करूँ क्या, क्या करूँ, ताज़ियत-नामा छपवा दूँ, या एक और ख़बर का इंतज़ार करूँ। ख़ुदग़र्ज़ हो चला है ज़माना, कि मौत भी शर्मसार है, मौत की ख़बर भी अब एक तिजारती हथियार है। बेचारे ख़बरी भी लाचार हैं, कि नौकरी की दरकार है, झूठी ख़बरों से ही चलता ये तिजारती दरबार है। यूं ही नहीं जारी हुआ ये आलमी फ़रमान है, झूठी ख़बर पर अमल करने वाला ख़ुद जिम्मेवार है।
बिन-बुलाए-मुशायरे मैं एक बिन बुलाए मुशायरे में शामिल हो गया, बस एक शाम की बज़्म ए सुखन से हैरान हो गया, अब समझ आया कि बाज़ार में इतनी नज़ाकत क्यों है, के हर जवां शायर हक़ीकी दौर से बदगुमान क्यों है, मैं तो बुज़ुर्गों की गिनती में आता हूं, मेरी बात और है, जवां शायर भी ग़मगीन हो, बात काबिले गौर है, चार लफ्जों में सिमट जाती है, सबने तहरीरें जो सुनाई, दर्दे दिल, जुदाई, रुसवाई, दग़ाबाज़ी और बेवफ़ाई। होता कौन हूं मैं, जो अपनी राय का इज़हार करूं, तौबा तौबा जो किसी और की शायरी पे ऐतराज़ करूं, खुद गवाह है, हर दूसरा शायर दिल का अलील निकला, कोई दिलबर से जुदा, कोई इश्क़ में बदनसीब निकला, इस उम्र में जो ज़माने से तल्ख़ियां पाले हैं, अभी से मायूसी, जफ़ा, तन्हाई, दर्दे दिल के हवाले है, अब इस दिलफ़रेब अंजुमन को किसके हवाले करूं? जब तक फ़ैसला ना हो जाए, ख़ुदा करे मैं सलामत रहूं।
बदचलन कुर्सियां क्या हुआ जब मुल्क यह आज़ाद हो गया, ज़मीं टुकड़े हो गए हिंदुस्तान और पाकिस्तान, लाखों बेघर हो गए सरहद के आर-पार, लाशों से लबालब हो गए शमशान औ कब्रिस्तान, एक और मंजर छूट गया दास्तान ए सुखन में, के एक और मसला हो गया तारीख ए वतन में, वो कुर्सियां जो सजती थी, फिरंगीयों के साथ, बगावत पर आमादा हो गई, आज़ाद वतन में, कुर्सियां जो क़ैद थी, रियासतों के हरम में, खुदकुशी करने लगी हिजरे चमन में, और कुछ जो कुर्सियां आजाद होने यूं लगी, के ख़ुद ब ख़ुद निकल पड़ी बाज़ार ए बदचलन में, और कुछ वो कुर्सियां तक्सीम जो ना हो सकी, आवारगी की लय में सरहदें पार कर चली, जम्हूरियत का जब नया आयाम शाया हो गया, के कुर्सियों का दाम बेलगाम हो गया, जुर्म की दुनिया में जो बदनाम हो चले, कुर्सियों के बाज़ार में खरीदार हो चले , एक बार फिर जो वो सरे सरकार हो जाए, गुनाह की दुनिया में रसूखदार हो जाए, बदनाम मुहल्लों में इज़्ज़तदार हो जाए, आवाम की नजरों में परवरदिगार हो जाए।
एक महजबीन ने मुझे खत लिखा एक महजबीन ने मुझे खत लिखा, आप की नज़्म सुनी बड़ा अच्छा लगा, ऐसा लगा कि मेरे लिए लिखी है यूं के मेरी जिंदगी की कड़ी आप की नज़्मों से जुड़ी है, बुरा ना माने तो एक बात कहूं, एक शाम कॉफी शॉप में मिले, कुछ गपशप कोई दिल की बातें सुने सुनाए साझा करें, पर डरती हूं कि ये बात मेरे शौहर को पता ना चले, आप तो शायर आजाद ख्याल हैं, बीवी से क्यों डरते होंगे, हजारों चाहने वाली हैं, आप की नज़्मों की, उनमें से कुछ को तो मिलते होंगे। अल्फाज क़ैद है जैसी आपकी कलम की रंगीनी में, ऐसे कैसे दिल की बातें हसरतों की स्याही से लिखते होंगे, यूं तो कोई औरत के जज़्बात की जानिब सोचता नहीं, बहुत सारे आशिकी के किस्से आपके भी रहे होंगे, आप का खत मिला शुक्र है, मेरी बीवी के हाथ नहीं पड़ा, वरना बेवजह सवालों को झेलना पड़ता, सच पर उसे भरोसा होता नहीं,इसलिए झूठ बोलना पड़ता, कहीं आप भी कोई शायरा तो नहीं, जो अपनी नज़्मों को सुनाने के लिए समायीन ढूंढती हैं, आपके शौहर सुनते नहीं, तो किसी और गरीब शायर को ढूंढती हैं। आप का न्योता मंजूर है, लेकिन शर्त यह है, नज्में सुननी है तो कोई बात नहीं, अपनी सुनानी है तो फिर ऐसा करें, 5 500 के नोट पर्स में ले आए किसी को पता ना चले
खुदाई साज़िश में शामिल ये भंवरे जो कलियों को बहला रहे हैं, कोई आशिकी का नग़मा गुनगुना रहे हैं, खुदाई साज़िश में शामिल हो जैसे, या कुदरत का दस्तूर निभा रहे हैं। शुक्राना करूं या के सजदा करूं मैं, किसी आफ़रीन को आईना दिखला रहे हैं। वो बादल जो उजले थे कुछ वक्त पहले अभी यूं के काले हुए जा रहे हैं, उठे थे कहां से और पहुंचे कहां पर, आबे हयात को बरसा के जैसे, बहारों को न्यौता दिए जा रहे हैं। शुक्राना करूं या के सजदा करूं मैं, जो के जिंदगी का क़ायदा पढ़ा रहे हैं। मैं तो अदना सा नाज़िर जो ठहरा, कहां देख सकता हूं इन नज़ारों से आगे, के समंदर के नीचे, सितारों से आगे, ये किसकी हकूमत बिछी हुई है, जो है बेनज़ीर मगर आंखों से ओझल, ना होते हुए भी छाई हुई है। शुक्राना करूं या के सजदा करूं मैं, जो ख़ुत्बा ए हक़ीक़त समझा रही हैं।
दिलबर को सुनाने के लिए उम्रे दराज़ मांग कर लाए थे किस लिए, नज्में जो लिखी थी कभी, दिलबर को सुनाने के लिए। ग़ुनाह जो ना कर सका, फिर से दोहराने के लिए, या वो गुनाह जो हो गए, उनकी माज़रत के लिए। गुनाह तो गुनाह नहीं, जब तक न साबित हो जाए, फ़ैसला जो अब उम्मीद से है, पैदा हो जाने के लिए। एक दुआ मांगू मैं, क़ाज़ी की सलामती के लिए, बेरहम उम्र गुज़री जाती है, जिसके फ़ैसले के लिए। या ख़ुदा अब तो बता, के अब करूं मैं क्या, कब तक शायरी करता रहूं, रिहा हो जाने के लिए।।
जुगाड़ हो गया ये जब्र भी देखा है, तारीख की नज़रों ने, लम्हों ने ख़ता की सदियों ने सजा पाई। ऐसा ही गुज़रा है कुछ, इस वतन के साथ, आज़ाद क्या हुआ के बेलगाम हो गया। खूनी दरिंदे आ गए, जाने कहां से क्या, सियासत क्या मिली, कि कत्लेआम हो गया। सरहदें लाल हो गई, श्मशान औ कब्रिस्तान, तक्सीम क्या हुआ, के दुश्मन ए जान हो गया। सदियों से जो अरमान थे, नफ़रत निभाने के, आज़ाद मुल्क में सब इंतज़ाम हो गया। तहज़ीब का करता रहा, जो फ़ख्र उम्र भर, अपनी जुबां को छोड़, बदज़ुबान हो गया। वतन परस्ती के नए आयाम शाया हो गए। चुप जो ना रहा, बेज़ुबान हो गया। आज बदले दौर में रोटी मिली तो क्या, ज़मीं से अपनी कट गया, खाना-बदोश हो गया। वो जो दीदावर कभी पैदा हुआ यहां, नरगिस को रोता छोड़, हिजरे वतन हो गया। हजूम देखता हूं के, फिर से सोचता हूं क्या, वह जो कभी हिंद था,आज हो गया है क्या। आख़िर क्या हुआ के, क्या से क्या हो गया, दौलत ए मुल्क़ मिल गई, सब जुगाड़ हो गया।
खानदानी ख़िदमतगार तुम्हारा खत मिला सोचा कि फाड़ कर फेंक दूं या बेफिक्र हो जाऊं, तुम अपने मुस्तक़बिल से बेज़ार हो, तो जा कर सो जाऊं, कुछ बात है तुम्हारी मासूमियत में, जो मुझे सोने नहीं देती, सताती है, तड़पाती है, ठीक से रोने भी नहीं देती, कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त, क्या कहते हो रोते बच्चे से, बूढ़े बाप से हर रोज़? के एक फरिश्ता आसमान से उतरेगा, तेरा झोपड़ा बनाने, या तेरे नाक़ाम ज़मीर को, सैयाद की नजरों से बचाने, के ये एक दिलचस्प खेल है, कोई त्यौहार नहीं, तुम्हारा हाक़िम एक सैय्याद है, मददगार नहीं, एक बार दाना डाल के, जाल बिछा आता है, फिर तुम्हारी मुफ़लिसी को ठेंगा दिखा जाता है, बड़े बड़े खिलाड़ी सेठ आ जाते हैं, तुम्हारे हक़ की जमीन, आबो हवा बिक जाते हैं, ये सच है के सियासत एक बाज़ार है, तुम्हारे रहनुमाओं को सिर्फ़ मुनाफ़े से सरोकार है, नाजायज़ है उम्मीदों का सौदा, क्यों कोइ तुम पे मेहरबान है? के तुम्हारे ही कांधों पर खड़ा, ये सियासी बाज़ार है, झटक दे एक बार और देख तमाशा, तू इस मुल्क का मालिक है, या खानदानी ख़िदमतगार है
सियासत एक खुला बाज़ार है दिलचस्प खेल है ये,जश्ने आवाम है, हरेक शरीफ़ औ बदमाश का ये आख़िरी मुक़ाम है। पाँच बरस में एक बार आता है ये मंज़र, हाथ जोड़कर घूमता है हाक़िम, गली-गली दर-दर, वो जो गुम थे, एक वक्फे से, ख़ुद घर चले आएंगे। वायदे, गारंटिया और कुछ नक़दी भी तुम्हारे नाम कर जाएंगे। यही खेल है हर बार जो तुम समझते हो कि समझ गए, फिर वही होता है, जो होता आया है, वो आया था जो घर पे, फिर से ग़ुम हो जाता है। जानते हो क्या और जताते हो क्या? कमाते हो क्या और बचाते हो क्या? किसी रहगुज़र को तुम पे रहम आए तो क्या? आज का तो ठीक कल की सोचते हो क्या? झूठे रहनुमाओं की ख़ुदगर्ज़ी से लाचार है, तुम्हारा भरोसा हकीक़त से बेज़ार है, याद रख कि सियासत एक खुला बाज़ार है, तुम सिर्फ एक मोहरे हो, जो बिकने को तैयार है। बच्चों की सोच, खुद से ही ये अहद कर ले, हालात ठीक नहीं, किसी और की भी नसीहत ले ले, यही तो खेल है जो तेरी समझ से बाहर है, तू ही बता, तेरी बदहाली के लिए कौन ज़िम्मेवार है।।
नीलाम हो जाओ मंज़िले मक़सूद हो, बेशर्त मोहब्बत भी, बेपनाह दौलत हो, बेशुमार शोहरत भी। मुमकिन नहीं है दोस्त, नासमझी नादानी है, बस यही बात मैंने, आज तुम्हें समझानी है । अभी अभी तो आए हो, इस बेज़ार से शहर में, टूटे हुए बाशिंदों के, धूल औ फ़िज़ां के क़हर में। ये चमक-दमक ये रंगों बू, हसीन नजर आते हैं। हो ना हो, ये कुछ कमज़र्फ़ अमीरों की करामातें हैं। बहुत मुमकिन है, कि ये एक बेपायां दौड़ है, बाज़ार की हरकत का सिकंदर कोई और है। हर इंसान यहां अपनी औक़ात से ज़्यादा है, न हो अक्ल का मालिक, अपनी ताकत पे आमादा है, इससे पहले कि भूख से बेहाल हो जाओ, तिनका तिनका, क़तरा क़तरा, ख़र्च हो जाओ। रोटियां जो बांध के लाए थे, खाके सो जाओ, हसरतों को संभाल के रख लो, नीलाम हो जाओ।
रंगीले अल्फाज मोहब्बत जो एक लफ्ज़ है, इकरार है, जुस्तजू भी है। रंग जो के एक लफ्ज़ है, पहचान है। आरजू भी है।। जुड़ गए कुछ इस तरह से मेरे जहन के साए से तकी। रंगीले अल्फाज एक अंदाज ए बयां एक बज़्म ए सुखन भी है।। रंगीले अल्फाज और अफसानों का खजाना लेकर, चला आऊंगा तुझ से मिलने यूं ही। के तेरी रंगीन हसरतों का सबब मेरी कैफियत में भी है।। मांगता रहूं मैं दाद, मेरी फितरत में नहीं। कुछ मांगना है तो खुदा से मांग, एक रूहानी हिदायत भी है।।
अधूरी ख्वाहिशें अधूरी ख्वाहिशें जो मेरे मुस्तक़बिल पे शाया हैं, सोचता हूं काग़ज़ पर बिछा दूं , एक ख़त लिखूं। काग़ज़ कलम उठाता हूं, के तुम्हें देखता हूं, तुम्हारा तसव्वुर छा जाता है, काग़ज़ रंगीन हो जाता है।। क्या लिखूं मैं अपने बारे में, कि मेरा हाल क्या है, पलक झपकता हूं, के जज़्बातों का सैलाब उमड़ आता है। एहसास है, कि तुम भी मेरी राह में आंखें बिछाए हो। मेरी आह फ़िज़ाँ में खुल जाती है, काग़ज़ ग़मगीन हो जाता है।। याद है, जब तुम्हारा कान का बाला मेरी शेरवानी से उलझा था,के तुमने मेरे दिल की धड़कन सुनी होगी। हर धड़कन, दिल उसी समाईंन को ढूंढता है। तुम्हीं वो समाईन हो, बज़्म ए धड़कन में, के हर अल्फ़ाज़ रंगीन हुआ जाता है।।
रक़ीब कल तक हबीब था जो मेरा आज रक़ीब हो गया, मेरा वजूद जो कहीं और था आज क़रीब हो गया। शुक्राना करूं मैं उसकी फितरत का, दिल की बात ज़ुबाँ पे लाया के, मैं ज़हनी मरीज़ हो गया। नजरों से हट गया पर मैंने जाने ना दिया। मैं दिल तोड़ने वाले की हिम्मत का मुरीद हो गया। तल्ख़ियां जो ताजा है, खुशनसीबी है, ख़ुदा की नेमत है, कल जो नजरों से हटा आज दिल से दूर हो गया। खुशफहमियां गलतफहमियां किसी शराब से कम नहीं, हकीकत जो जानी मैंने, मैं फिर से फ़कीर हो गया।।
मां की दुआएं मेरी मां की दुआएं मेरे साथ रहती हैं, जब भी सांझ होती है तो शम्मा जला देती हैं। उम्मीद की झोली कहीं ख़ाली न हो जाए कभी, इसलिए कुछ हिम्मत और सब्र डालती देती हैं। नज़र नहीं आती, मेरे ईमान पे नज़र रखती है, भूल भी जाऊं गर कभी, एन वक्त मुझे टोक देती है। नवाब की बेटी थी पर मुफ़लसी में गुजारी सारी, झूठ बोलना और ईमान का सौदा — तौबा, नवाबी शान है, इसकी इजाज़त नहीं देती है, देखती है, सुनती है पर नज़र नहीं आती, मेरी मां की दुआएं मेरे साथ रहती हैं।
मंजिले मोहब्बत मंजिलों पर पहुंचना है सबको तुम्हें भी और मुझे भी राहों की लम्बाइयाँ न देख उठाओ एक कदम मंजिल की ओर दो कदम मंजिल चली आएगी तुम्हारी ओर। बेशर्त मोहब्बत की चाहत है तुम्हें भी और मुझे भी हालात की मजबूरियां ना देख उठा एक कदम मोहब्बत की ओर दो कदम मोहब्बत चली आएगी तुम्हारी ओर। बेपनाह सुकून की तलाश बेपनाह है तुम्हें भी और मुझे भी कीमत अदा करनी होगी परवाह न कर उठा एक कदम सकून की ओर दो कदम सकून चलाएंगे तुम्हारी ओर। दौड़ना बंद करें तो फिर ऐसा क्यों ना करें थाम के हाथ मेरा दो कदम अंदर चल पड़ें मंजिले मोहब्बत और सुकून एक साथ खुद ब खुद चल पड़ेंगे हमारी ओर
लाल गुलाबी एक ही रंग है तो रंग क्या है एक ही ढंग है तो ढंग क्या है वही सोच है तो सोच क्या है वही रिवायत है तो रिवायत क्या है इससे पहले कि समां बदल जाए, रंग ढंग और सोच बेमानी हो जाए नई रिवायतओं को दावत दे कर क्यों न एक नए हमसफर औ हमनवां को ले आयें तरक्की याफ्ता हो तुम तुम्हारी सोच तुम्हारी फराखदिली एक नई मिसाल कायम हो जाए मेरी तो जुस्तजू यह है, दुआ भी यही है नए हम सफर के साथ, तुम्हारा लाल गुलाबी हो जाए।